प्लास्टिक

सत्य का दूसरा पक्ष: भारत की नदियों में प्लास्टिक संकट

भारत की नदियों में प्लास्टिक संकट, मानवीय स्वास्थ्य और भविष्य का रोडमैप

विकास की कहानियों पर विश्वास कर लेते हैं, लेकिन नदियों की कराहती हुई "अपनी कहानी" सुनने से इनकार कर देते हैं। हम प्लास्टिक की सुविधा के "झूठ" को अपना लेते हैं, लेकिन इसके अदृश्य विनाश के "पक्ष" को अनदेखा कर देते हैं। भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ वह दुनिया का सबसे बड़ा प्लास्टिक प्रदूषक बन चुका है, जो प्रति वर्ष लगभग 93 लाख टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करता है, जो वैश्विक कुल का लगभग 20 प्रतिशत है । यह रिपोर्ट उस "दूसरे पक्ष" का विस्तृत विश्लेषण है जिसे सुनने और समझने की आवश्यकता है।

संकट का वैश्विक और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: सुविधा का भ्रम

प्लास्टिक प्रदूषण आधुनिक सभ्यता का वह "झूठ" है जिसे हमने अपनी जीवनशैली का अनिवार्य हिस्सा बना लिया है। भारत में प्लास्टिक कचरे की समस्या भयावह दर से बढ़ रही है, जिसका मुख्य कारण तीव्र शहरीकरण, बढ़ती जनसंख्या और उपभोग के बदलते पैटर्न हैं । सांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार, भारत में केवल 81 प्रतिशत प्लास्टिक कचरा ही एकत्र किया जाता है, जिसका अर्थ है कि लगभग 19 प्रतिशत कचरा सीधे हमारे पर्यावरण, नालों और नदियों में फेंक दिया जाता है या खुले में जला दिया जाता है ।

भारत में प्रति व्यक्ति प्लास्टिक की खपत लगभग 11 किलोग्राम प्रति वर्ष तक पहुँच गई है । यद्यपि यह विकसित देशों की तुलना में कम लग सकता है, लेकिन भारत की विशाल जनसंख्या घनत्व के कारण यह मात्रा पारिस्थितिकी तंत्र के लिए असहनीय हो जाती है । शहरी केंद्र इस संकट के अग्रिम मोर्चे पर हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली प्रतिदिन लगभग 1,113 टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करती है, लेकिन इसकी प्रसंस्करण क्षमता केवल 871 टन है, जिससे प्रतिदिन 242 टन कचरा अनियंत्रित रह जाता है ।

भारत के प्रमुख राज्यों में प्लास्टिक कचरे का भार

राज्य वार्षिक उत्पादन (लाख टन) प्रतिशत योगदान प्रमुख हॉटस्पॉट्स
महाराष्ट्र 4.51 13% मुंबई, पुणे, ठाणे
तमिलनाडु 4.16 12% चेन्नई, तिरुपुर, कोयंबटूर
गुजरात 4.16 12% अहमदाबाद, सूरत, वापी
उत्तर प्रदेश 3.12 9% कानपुर, आगरा, वाराणसी
पश्चिम बंगाल 2.77 8% कोलकाता, हावड़ा

यह डेटा स्पष्ट करता है कि औद्योगिक और घनी आबादी वाले राज्य इस समस्या के केंद्र में हैं। "झूठ" यह है कि हम प्लास्टिक का उपयोग "डिस्पोजेबल" (उपयोग के बाद फेंकने योग्य) मानकर करते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि यह कभी नष्ट नहीं होता, बल्कि केवल छोटे टुकड़ों में विभाजित होकर हमारे जल और भोजन में वापस आ जाता है।

नदियों की व्यथा: गंगा और यमुना का "अपना पक्ष"

भारत की नदियाँ केवल जल निकाय नहीं हैं; वे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रतीक हैं। फिर भी, वे प्लास्टिक और औद्योगिक अपशिष्ट का प्राथमिक डंपिंग ग्राउंड बन गई हैं। गंगा, जो 50 करोड़ से अधिक लोगों की जीवनरेखा है, दशकों के हस्तक्षेप के बावजूद भारी प्रदूषण का सामना कर रही है ।

गंगा नदी: पवित्रता और प्रदूषण का संघर्ष

गंगा बेसिन के पांच राज्यों में प्रतिदिन लगभग 10,160 मिलियन लीटर (MLD) सीवेज उत्पन्न होता है, लेकिन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) की क्षमता केवल 7,820 MLD है । यह अंतर (Gap) सीधे नदी में बहने वाले प्रदूषकों का मुख्य स्रोत है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने रिपोर्ट दी है कि प्रतिदिन 258.67 मिलियन लीटर अनुपचारित सीवेज गंगा में गिरता है ।

नदी खंड (Stretch) स्थिति (2018) स्थिति (2025) मुख्य प्रदूषक
हरिद्वार से सुल्तानपुर प्रदूषित (IV) सुधारित (हटाया गया) सीवेज, औद्योगिक
कन्नौज से वाराणसी प्रदूषित (IV) आंशिक सुधार कचरा, टैनरी अपशिष्ट
त्रिवेणी से डायमंड हार्बर प्रदूषित (III) आंशिक सुधार शहरी प्लास्टिक, औद्योगिक

भले ही कुछ क्षेत्रों में सुधार हुआ है, लेकिन 'फेकल कोलीफॉर्म' (मल संबंधी बैक्टीरिया) का स्तर अभी भी कई स्थानों पर सुरक्षित सीमा (500 MPN/100 mL) से सैकड़ों गुना अधिक है । वाराणसी में, गंगा एक "खुले सीवर" जैसी प्रतीत होती है जहाँ बैक्टीरिया का स्तर सामान्य से 150 गुना अधिक पाया गया है ।

यमुना: दिल्ली की मरती हुई धड़कन

यमुना नदी प्रदूषण के सबसे क्रूर रूप का उदाहरण है। दिल्ली से गुजरने वाला इसका 22 किलोमीटर का खंड, जो नदी के कुल प्रवाह का केवल 2 प्रतिशत है, कुल प्रदूषण का 80 प्रतिशत वहन करता है । मार्च 2025 तक मिशन यमुना क्लीनअप के तहत 1,300 टन कचरा हटाया गया था, लेकिन नवंबर तक नदी में फिर से जहरीला झाग तैरता देखा गया, जो अनुपचारित सीवेज और फॉस्फेट युक्त डिटर्जेंट का परिणाम है । यमुना में प्रतिदिन 641 मिलियन लीटर अनुपचारित सीवेज गिरता है ।

माइक्रोप्लास्टिक: अदृश्य शत्रु की घुसपैठ

माइक्रोप्लास्टिक प्लास्टिक प्रदूषण का वह सबसे खतरनाक "झूठ" है जो दिखाई नहीं देता लेकिन हर जगह मौजूद है। ये 5 मिलीमीटर से छोटे कण होते हैं जो बड़े प्लास्टिक के टूटने या सौंदर्य प्रसाधनों और कपड़ों के रेशों से उत्पन्न होते हैं ।

यमुना में माइक्रोप्लास्टिक का वितरण (2024-25 अध्ययन)

दिल्ली सरकार द्वारा संचालित एक अध्ययन (TERI द्वारा 49 स्थानों पर) ने चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं:

  • मानसून का प्रभाव: मानसून से पहले यमुना में माइक्रोप्लास्टिक की सघनता 6,375 कण प्रति घन मीटर थी, जो बारिश के बाद घटकर 3,080 कण रह गई। लेकिन यह प्रदूषण समाप्त नहीं हुआ, बल्कि नदी के किनारों की मिट्टी (Floodplain soil) में जमा हो गया, जहाँ सघनता 24.5 कण/किग्रा से बढ़कर 104.5 कण/किग्रा हो गई ।
  • प्रमुख स्रोत: पाए गए कणों में 95 प्रतिशत 'माइक्रोफाइबर' (सूक्ष्म रेशे) थे, जो मुख्य रूप से घरेलू धुलाई (Laundry) और टेक्सटाइल अपशिष्ट से आते हैं ।
  • भूजल संदूषण: अध्ययन में 42 भूजल स्थलों की जांच की गई, जहाँ औसतन 1,200 कण प्रति घन मीटर पाए गए, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल सतह पर नहीं, बल्कि हमारे पीने के पानी के स्रोतों के भीतर गहराई तक पहुँच चुका है ।

अन्य नदियों की स्थिति भी भिन्न नहीं है। अनुमान है कि गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियाँ प्रतिदिन 1 से 3 अरब माइक्रोप्लास्टिक कण बंगाल की खाड़ी में छोड़ती हैं ।

मानवीय स्वास्थ्य पर प्रभाव: शरीर का मौन क्षरण

हमने प्लास्टिक को अपनी सुविधा के लिए चुना, लेकिन अब वही प्लास्टिक हमारे अंगों में जमा होकर हमें भीतर से बीमार कर रहा है। शोध बताते हैं कि एक वयस्क व्यक्ति औसतन 39,000 से 52,000 माइक्रोप्लास्टिक कण प्रति वर्ष अनजाने में खा जाता है ।

माइक्रोप्लास्टिक का मानवीय अंगों में संचय और प्रभाव

शारीरिक प्रणाली प्रवेश मार्ग संचित कणों का साक्ष्य संभावित स्वास्थ्य जोखिम
परिसंचरण तंत्र रक्त प्रवाह 88.9% रक्त नमूनों में उपस्थिति धमनियों में सूजन, हृदय रोग
प्रजनन तंत्र अंतर्ग्रहण गर्भनाल (Placenta), वृषण (Testes), वीर्य बांझपन, भ्रूण विकास में बाधा
श्वसन तंत्र अंतःश्वसन फेफड़ों के ऊतक अस्थमा, सीओपीडी, कैंसर
पाचन तंत्र भोजन/पानी यकृत, प्लीहा, गुर्दे चयापचय विकार, डीएनए क्षति

प्लास्टिक के जलने से निकलने वाले जहरीले रसायन जैसे 'डाइऑक्सिन' और 'फ्यूरान' कैंसर और श्वसन संबंधी बीमारियों के जोखिम को बढ़ाते हैं । दिल्ली जैसे शहरों में, जहाँ वायु गुणवत्ता पहले से ही खराब है, प्लास्टिक का खुला दहन इस संकट को और अधिक घातक बना देता है ।

प्रदूषण के प्रमुख कारण: क्यों विफल हो रहे हैं प्रयास?

रिपोर्ट के अनुसार, प्रदूषण के कारणों को समझना निवारण की पहली सीढ़ी है। नदियाँ "स्वेच्छा" से प्रदूषित नहीं होतीं; यह मानवीय और प्रशासनिक विफलताओं का परिणाम है।

1. शहरीकरण और अपर्याप्त बुनियादी ढांचा: भारत के 60 प्रतिशत से अधिक शहरी सीवेज को बिना उपचार के नदियों में छोड़ दिया जाता है ।

2. औद्योगिक जवाबदेही का अभाव: टेक्सटाइल और टैनरी (चमड़ा) उद्योग नदियों के सबसे बड़े प्रदूषकों में से हैं।

3. अनौपचारिक क्षेत्र और कचरा पृथक्करण की कमी: कचरा पृथक्करण की दर 50 प्रतिशत से कम है ।

4. कृषि और रसायनों का प्रभाव: कृषि क्षेत्रों से होने वाला जल बहाव (Runoff) नदियों में उर्वरक और कीटनाशक लाता है, जिससे 'यूट्रोफिकेशन' होता है।

निवारण के उपाय: सुधार और नवाचार का पथ

भारत सरकार और भारतीय समाज ने मिलकर कई ऐसे कदम उठाए हैं जो इस संकट को बदलने की क्षमता रखते हैं।

1. नियामक सुधार: प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2025

  • डिजिटल ट्रेसिबिलिटी: 1 जुलाई 2025 से सभी प्लास्टिक पैकेजिंग पर क्यूआर कोड अनिवार्य होगा ।
  • अनिवार्य पुनर्चक्रण लक्ष्य: निर्माताओं को अपनी पैकेजिंग में एक निश्चित प्रतिशत पुनर्चक्रित प्लास्टिक का उपयोग करना होगा ।

2. तकनीकी नवाचार: प्लास्टिक से सड़कें और सफाई उपकरण

डॉ. राजगोपालन वासुदेवन (प्लास्टिक मैन): उन्होंने प्लास्टिक कचरे को बिटुमेन के साथ मिलाकर सड़कें बनाने की तकनीक विकसित की। उनके द्वारा बनाई गई सड़कें अधिक टिकाऊ होती हैं।

3. सामुदायिक और व्यक्तिगत प्रयास: प्रेरणादायक कहानियाँ

अफ़रोज़ शाह (वर्सोवा बीच): उन्होंने 50 लाख किलोग्राम कचरा हटाया और विलुप्त हो रहे कछुओं को वापस आने पर मजबूर कर दिया ।

भविष्य का परिदृश्य (2050): एक चेतावनी और अवसर

वैज्ञानिक मॉडल चेतावनी देते हैं कि यदि हम "बिज़नेस-एज़-यूज़ुअल" मोड में रहे, तो 2050 तक वैश्विक प्लास्टिक उत्पादन तीन गुना बढ़कर 265 मिलियन टन प्रति वर्ष हो सकता है ।

2025-2030 के लिए रणनीतिक रोडमैप

वर्ष लक्ष्य अपेक्षित परिणाम
2025 पूर्ण डिजिटल ट्रेसिबिलिटी लागू करना पारदर्शी कचरा प्रबंधन, अवैध डंपिंग में कमी
2026 कठोर प्लास्टिक में 40% पुनर्चक्रित सामग्री कच्चे प्लास्टिक (Virgin plastic) की मांग में कमी
2030 100% पुनर्चक्रण योग्य पैकेजिंग नदियों में प्लास्टिक रिसाव का पूर्ण नियंत्रण

निष्कर्ष: सत्य के साथ खड़े होने का समय

क्या हम प्रकृति के प्रति "पूर्वाग्रही" बने रहेंगे और प्लास्टिक की सुविधा के झूठ पर विश्वास करते रहेंगे? या हम नदी के "पक्ष" को सुनेंगे और उसके दर्द को समझेंगे?

नदियाँ निर्जीव जल निकाय नहीं हैं, बल्कि वे जीवित संस्थाएं (Living entities) हैं जो हमारे अस्तित्व का आधार हैं । हमें अपनी जीवनशैली में "शून्य कचरा" (Zero Waste) के दर्शन को अपनाना होगा। जैसा कि रहीम ने सदियों पहले कहा था— "बिन पानी सब सून", और वह पानी तभी बचेगा जब हम उसे प्लास्टिक के जहर से बचाएंगे ।

rashtra bandhu

"I’ve always loved sharing my knowledge with people who are genuinely curious and seeking it. But I’ve faced limitations—there are only very few people I can reach. One thing I’ve noticed, though, is that everyone craves diverse knowledge from around the world—news or, you could say, information that keeps them updated. When I decided to spread that kind of info on a larger scale, blogging came my way, and the journey continues to this day..."

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