मोदी युग का निष्पक्ष ऑडिट: वादों, फैसलों और वास्तविक नतीजों की ज़मीनी पड़ताल
नरेंद्र मोदी सरकार का कार्यकाल भारतीय राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का एक ऐसा अध्याय रहा है, जिसने देश के नीतिगत विमर्श को पूरी तरह बदल दिया। राजनीति में जब किसी नेतृत्व को लगातार पूर्ण बहुमत हासिल होता है, तो उसके फैसलों का दायरा केवल सत्ता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे आम नागरिक के दैनिक जीवन पर असर डालता है। पिछले दशक में लागू की गई कई बड़ी नीतियों को लेकर जहां एक तरफ ऐतिहासिक बदलाव के दावे किए गए, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और नागरिक समाज द्वारा दर्जनों गंभीर चूकों और विफलताओं की ओर इशारा किया गया। किसी भी जीवंत लोकतंत्र की पहचान यही है कि वह नारों और हेडलाइन्स से आगे बढ़कर आधिकारिक रिकॉर्ड, ज़मीनी असर और ठोस तथ्यों की कसौटी पर हर नीतिगत कदम की पड़ताल करे।
आर्थिक प्रयोग और ज़मीनी हकीकत
आर्थिक मोर्चे पर सबसे निर्णायक मोड़ नवंबर 2016 की नोटबंदी का फैसला था। काले धन और नकली नोटों पर प्रहार के उद्देश्य से लागू किए गए इस कदम के बाद, रिज़र्व बैंक के आधिकारिक आंकड़ों ने साफ किया कि 99.3 प्रतिशत से अधिक नकदी बैंकिंग प्रणाली में वापस लौट आई। इसके साथ ही नकदी पर निर्भर असंगठित क्षेत्र, दैनिक वेतनभोगी और छोटे कारोबारियों को महीनों तक भीषण आर्थिक झटके का सामना करना पड़ा। तात्कालिक राहत के तौर पर लाया गया 2,000 रुपये का नोट भी बाद में वापस ले लिया गया।
इसके बाद आया जीएसटी, जिसने अप्रत्यक्ष कर ढांचे को एकीकृत तो किया, लेकिन शुरुआती वर्षों में जटिल अनुपालन और तकनीकी अड़चनों के कारण छोटे कारोबारियों पर भारी बोझ बना। 2019-20 में महामारी से ठीक पहले आर्थिक विकास दर का घटकर चार प्रतिशत के आसपास आ जाना यह साबित करता है कि अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को इन झटकों से उबरने में लंबा वक्त लगा।
रोज़गार का परिदृश्य और युवाओं की उम्मीदें
2014 के लोकसभा चुनाव में हर साल करोड़ों नए रोज़गार पैदा करने का वादा सबसे प्रमुख था। आधिकारिक आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2017-18 के अनुसार देश में बेरोज़गारी दर 45 साल के उच्चतम स्तर 6.1 प्रतिशत पर पहुंच गई थी। हालांकि बाद के वर्षों में कार्यबल भागीदारी में सांख्यिकीय सुधार दिखा, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र में स्थायी और गुणवत्तापूर्ण नौकरियों की कमी बनी रही। 'मेक इन इंडिया' अभियान के बावजूद जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी 16-17 प्रतिशत के आसपास ही सीमित रही।
सेना में अल्पकालिक भर्ती की 'अग्निपथ' योजना के खिलाफ देशभर में भड़के युवाओं के आक्रोश ने स्थायी रोज़गार की भूख को उजागर किया। वहीं दूसरी तरफ, राष्ट्रीय स्तर पर नीट-यूजी और यूजीसी-नेट जैसी शीर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक और तकनीकी गड़बड़ियों के मामलों ने लाखों युवाओं के भविष्य को अधर में लटकाया।
संसद की गरिमा और सांविधानिक संतुलन
संसदीय लोकतंत्र की बुनियाद स्वस्थ बहस और समितियों द्वारा विधेयकों की बारीक जांच पर टिकी होती है। इस दौर में प्रमुख कानूनों को बिना व्यापक संसदीय चर्चा के पारित कराने की प्रवृत्ति देखी गई। 2023 के शीतकालीन सत्र में 146 विपक्षी सांसदों का ऐतिहासिक निलंबन और उनकी गैर-मौजूदगी में भारतीय न्याय संहिता जैसे बड़े आपराधिक कानूनों का पारित होना विधायी संतुलन की दृष्टि से चिंताजनक था।
चुनावी बॉन्ड योजना संस्थागत पारदर्शिता पर सबसे बड़ा सवाल बनी। इस योजना ने राजनीतिक दलों को असीमित और गोपनीय चंदा लेने का रास्ता दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने नागरिकों के जानने के अधिकार का उल्लंघन बताते हुए असंवैधानिक करार दिया। शीर्ष अदालत के आदेश के बाद ही भारतीय स्टेट बैंक को दानदाताओं और राजनीतिक दलों के संबंधों की सूची सार्वजनिक करनी पड़ी। इसके अलावा दिल्ली की चुनी हुई सरकार के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अध्यादेश के ज़रिए पलटने की कोशिश ने भी केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव बढ़ाया।
संकट प्रबंधन: महामारी से मणिपुर तक
मार्च 2020 में केवल चार घंटे के नोटिस पर लागू हुए देशव्यापी लॉकडाउन ने देश को एक भीषण मानवीय संकट के सामने ला खड़ा किया। लाखों प्रवासी मज़दूर अपने परिवारों के साथ सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर गांव लौटने को मजबूर हुए, क्योंकि उनके पास न राशन था और न काम।
2021 की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन, आवश्यक दवाओं और वेंटिलेटर की कमी के चलते पैदा हुई अराजकता को देश भूल नहीं पाया है। घरेलू टीकाकरण की ठोस तैयारी से पहले वैक्सीन का बड़े पैमाने पर निर्यात करना रणनीतिक चूक माना गया। वहीं दूसरी ओर, मई 2023 से पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में शुरू हुई जातीय हिंसा को नियंत्रित करने में प्रशासनिक मशीनरी की विफलता, महीनों तक इंटरनेट पाबंदियां और विस्थापितों का संकट शासन व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
सीमा सुरक्षा और विदेश नीति के पेंच
विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के स्तर पर पाकिस्तान के प्रति भारत का रुख अक्सर एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव की ओर मुड़ता दिखा। दिसंबर 2015 में नवाज़ शरीफ के पारिवारिक कार्यक्रम में अचानक लाहौर पहुंचने की व्यक्तिगत कूटनीति के कुछ ही हफ्तों बाद पठानकोट एयरबेस पर हमला हुआ, जिसके बाद पाकिस्तानी जांच दल को एयरबेस की जांच की अनुमति दी गई।
मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ शुरू हुआ सैन्य गतिरोध और गलवान घाटी में 20 भारतीय जवानों का बलिदान देश के लिए एक बड़ा सामरिक झटका था। एलएसी पर कई गश्त बिंदुओं पर दोनों सेनाओं के पीछे हटने के बाद बने 'बफर ज़ोन' के कारण भारतीय सेना के पारंपरिक गश्त क्षेत्रों तक पहुंच सीमित हुई। 'आत्मनिर्भर भारत' के नारों के बावजूद भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर के पार बना रहना यह दिखाता है कि औद्योगिक कच्चे माल और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए हमारी निर्भरता अब भी बरकरार है।
नागरिक अधिकार और प्रशासनिक संवेदनशीलता
नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को दिसंबर 2019 में पारित किए जाने के बाद इसके नियम अधिसूचित करने में चार साल से अधिक का समय लगना यह दर्शाता है कि नीतिगत स्तर पर स्पष्टता का अभाव था। इस कानून और प्रस्तावित एनआरसी को लेकर फैली भ्रांतियों ने बड़े आंदोलन और दिल्ली दंगों जैसी दुखद घटनाएं देखीं।
यूएपीए और देशद्रोह जैसे सख्त कानूनों का इस्तेमाल पत्रकारों और असहमति जताने वाले कार्यकर्ताओं के खिलाफ बढ़ने के मामले भी चिंता का विषय रहे। पेगासस स्पाइवेयर से जुड़ी निगरानी के आरोपों ने निजता के अधिकार पर सवाल खड़े किए। वहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाली महिला पहलवानों द्वारा कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों पर कार्रवाई में हुई महीनों की देरी और खेल संघों में आंतरिक शिकायत समितियों का न होना व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाता है। इसके साथ ही, 2021 की नियमित जनगणना का अनिश्चितकाल के लिए टलना देश के नीति-निर्माण को विश्वसनीय आंकड़ों से वंचित रखे हुए है।
मोदी युग की 76 प्रमुख नीतिगत और प्रशासनिक चुनौतियां: एक नज़र
नीचे दी गई तालिका में उन सभी 76 प्रमुख मुद्दों, नीतिगत चूकों और विवादों को संकलित किया गया है, जो इस दशक में सार्वजनिक विमर्श और आलोचना के केंद्र में रहे:
| क्र.सं. | प्रमुख नीतिगत विफलता या विवाद | संबंधित क्षेत्र | मुख्य प्रभाव व संदर्भ |
|---|---|---|---|
| 1 | 500 और 1,000 रुपये के नोटों की अचानक नोटबंदी | अर्थव्यवस्था | नकदी संकट और बाजार में तात्कालिक ठहराव |
| 2 | नोटबंदी के तुरंत बाद देशभर में उपजा नकदी संकट | अर्थव्यवस्था | बैंकों और एटीएम के बाहर हफ़्तों लंबी कतारें |
| 3 | असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्र के कारोबार पर भारी चोट | अर्थव्यवस्था | छोटे उद्यमों, श्रमिकों और कृषि व्यापार पर गंभीर असर |
| 4 | नोटबंदी के साथ 2,000 रुपये का नया नोट जारी करने का फैसला | अर्थव्यवस्था | काले धन पर रोक के मूल तर्क के विपरीत कदम |
| 5 | बाद में 2,000 रुपये के नोट को भी चलन से बाहर करना | अर्थव्यवस्था | नीतिगत अस्थिरता और बार-बार मुद्रा प्रबंधन में बदलाव |
| 6 | वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का जल्दबाज़ी में क्रियान्वयन | अर्थव्यवस्था | तकनीकी खामियों और भ्रम के कारण व्यापार में रुकावट |
| 7 | शुरुआती दौर में जीएसटी का छोटे व्यापारियों पर भारी अनुपालन बोझ | अर्थव्यवस्था | जटिल इनवॉइसिंग और रिटर्न फाइलिंग की जटिलताएं |
| 8 | 2014 के चुनाव में किए गए बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन के वादों की विफलता | रोज़गार | युवाओं के लिए औपचारिक नौकरियों की स्थायी कमी |
| 9 | 2017-18 में बेरोज़गारी दर का 45 साल के उच्चतम स्तर (6.1%) पर पहुंचना | रोज़गार | आधिकारिक पीएलएफएस सर्वेक्षण द्वारा उजागर संकट |
| 10 | कोविड महामारी से पहले ही आर्थिक विकास दर में आई तीव्र गिरावट | अर्थव्यवस्था | 2018-19 में विकास दर का घटकर 4% के करीब आना |
| 11 | 2015 के भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश को वापस लेना पड़ना | कृषि व भूमि | किसानों के विरोध के बाद कानून पर सरकार का पीछे हटना |
| 12 | 2020 के तीन कृषि कानूनों के कारण देशव्यापी असंतोष | कृषि | पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में ऐतिहासिक आंदोलन |
| 13 | संसद में बिना विस्तृत चर्चा और मतदान के कृषि कानूनों को पारित कराना | विधायी प्रक्रिया | संसदीय मर्यादा और विपक्ष की अनदेखी का आरोप |
| 14 | एक साल से अधिक चले किसान आंदोलन के बाद कानूनों को निरस्त करना | कृषि नीति | राजनीतिक दबाव में बिना सहमति बनाए कानून लाने का परिणाम |
| 15 | न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी की मांग पर अनिर्णय | कृषि | किसानों के साथ समझौते के बावजूद कानूनी ढांचे का अभाव |
| 16 | मात्र चार घंटे के नोटिस पर देशव्यापी कोविड लॉकडाउन की घोषणा | महामारी प्रबंधन | आम जनजीवन और आपूर्ति श्रृंखला में एकाएक अफरातफरी |
| 17 | लॉकडाउन के दौरान करोड़ों प्रवासी कामगारों का पैदल पलायन | मानवीय संकट | भोजन, आश्रय और परिवहन के बिना शहरों से पलायन |
| 18 | प्रारंभिक लॉकडाउन में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखला में समन्वय की कमी | लॉजिस्टिक्स | राज्यों और केंद्र के बीच तालमेल का अभाव |
| 19 | 2021 की कोविड दूसरी लहर से निपटने के लिए पूर्व-तैयारी का अभाव | स्वास्थ्य नीति | पहली लहर के बाद स्वास्थ्य ढांचे की अनदेखी |
| 20 | दूसरी लहर के दौरान देश के प्रमुख शहरों में मेडिकल ऑक्सीजन का गंभीर संकट | स्वास्थ्य ढांचा | ऑक्सीजन लॉजिस्टिक्स की विफलता से हज़ारों जानें जाना |
| 21 | गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों के लिए अस्पतालों में बेड और वेंटिलेटर की भारी कमी | स्वास्थ्य ढांचा | सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का चरमराना |
| 22 | वैक्सीन खरीद और ऑर्डर देने की गति व योजना में शुरुआती देरी | टीकाकरण | समय पर अग्रिम खरीद न करने से टीकाकरण में सुस्ती |
| 23 | देश में कमी के बावजूद 'वैक्सीन मैत्री' के तहत टीकों का समयपूर्व निर्यात | कूटनीति | घरेलू किल्लत के समय बाहरी निर्यात पर उठे सवाल |
| 24 | पीएम केयर्स फंड के संचालन और वित्त पोषण में पारदर्शिता का अभाव | वित्तीय पारदर्शिता | सार्वजनिक दान के बावजूद निजी ट्रस्ट जैसा दर्जा |
| 25 | पीएम केयर्स फंड को कैग (CAG) की स्वतंत्र ऑडिट जांच से बाहर रखना | जवाबदेही | सार्वजनिक जांच और आरटीआई के दायरे से बाहर रखना |
| 26 | नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) का विवादास्पद स्वरूप | सांविधानिक ढांचा | धर्म-आधारित नागरिकता प्रावधानों पर तीखा विरोध |
| 27 | सीएए पारित होने के बाद नियमों को अधिसूचित करने में चार साल की देरी | नीतिगत अमल | 2019 में कानून बनने के बाद 2024 में नियम लागू होना |
| 28 | देशभर में एनआरसी (NRC) लागू करने को लेकर उपजा राजनीतिक भ्रम | सामाजिक स्थिरता | विभिन्न सरकारी बयानों में विरोधाभास |
| 29 | सीएए-विरोधी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कड़ा प्रशासनिक रुख | नागरिक अधिकार | असहमति के स्वरों को दबाने के आरोप |
| 30 | 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की रोकथाम और प्रशासनिक विफलता | कानून-व्यवस्था | 50 से अधिक नागरिकों की जान गई, भारी संपत्ति का नुकसान |
| 31 | अगस्त 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर में महीनों तक संचार साधनों पर पाबंदी | नागरिक अधिकार | इतिहास का सबसे लंबा इंटरनेट व मोबाइल ब्लैकआउट |
| 32 | अनुच्छेद 370 हटने के बाद पूर्व मुख्यमंत्रियों और मुख्यधारा के नेताओं की लंबी हिरासत | लोकतंत्र | लोकतांत्रिक राजनीतिक गतिविधियों पर महीनों पूर्ण विराम |
| 33 | जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस लौटाने में लगातार देरी | संघवाद | केंद्र शासित प्रदेश के रूप में लंबी अनिश्चितता |
| 34 | घाटी में सुरक्षा और राजनीतिक सामान्य स्थिति बहाली में निरंतर चुनौतियां | सुरक्षा | लक्षित हत्याएं और लोकतांत्रिक शून्यता |
| 35 | पत्रकारों, नेताओं और कार्यकर्ताओं पर पेगासस स्पाइवेयर इस्तेमाल के आरोप | निजता व सुरक्षा | नागरिक निगरानी और निजता के हनन का बड़ा विवाद |
| 36 | यूएपीए (UAPA) के तहत व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करने के कड़े प्रावधान | मानवाधिकार | बिना त्वरित सुनवाई के वर्षों जेल में रखने के मामले |
| 37 | सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बावजूद देशद्रोह कानून का बार-बार इस्तेमाल | अभिव्यक्ति | असहमति और आलोचना को अपराध की श्रेणी में डालना |
| 38 | विरोध-प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था के नाम पर इंटरनेट का बार-बार शटडाउन | डिजिटल अधिकार | दुनिया में सबसे अधिक बार इंटरनेट बंद करने वाला देश |
| 39 | स्वतंत्र मीडिया पर दबाव और अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में गिरावट | मीडिया स्वतंत्रता | निष्पक्ष पत्रकारिता के सामने प्रशासनिक व वित्तीय अड़चनें |
| 40 | केंद्रीय जांच एजेंसियों (ED, CBI, IT) का विपक्ष के खिलाफ असंतुलित उपयोग | संस्थागत स्वायत्तता | विपक्षी नेताओं पर मुकदमों और छापों का अत्यधिक अनुपात |
| 41 | राजनीतिक फंडिंग के लिए चुनावी बॉन्ड (इलेक्टोरल बॉन्ड) योजना लाना | राजनीतिक सुधार | कॉरपोरेट चंदे को गुमनाम करने की व्यवस्था |
| 42 | चुनावी बॉन्ड के तहत राजनीतिक चंदे को जनता की नज़र से पूरी तरह गुप्त रखना | पारदर्शिता | नागरिकों के सूचना के अधिकार का सीधा हनन |
| 43 | कंपनियों के मुनाफे के आधार पर चंदा देने की सीमा को समाप्त करना | वित्तीय शुचिता | मुखौटा कंपनियों और घाटे वाली फर्मों से चंदे का रास्ता खुला |
| 44 | चुनावी बॉन्ड की सांविधानिक वैधता पर समय रहते ध्यान न देना | न्यायिक प्रक्रिया | योजना पर सवाल उठने के वर्षों बाद तक चंदा जारी रहा |
| 45 | सुप्रीम कोर्ट के कड़े आदेश के बाद ही एसबीआई द्वारा चुनावी बॉन्ड का डेटा देना | जवाबदेही | बैंक द्वारा डेटा सार्वजनिक करने में बार-बार टालमटोल |
| 46 | राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून का सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज होना | न्यायपालिका | जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका के हस्तक्षेप की कोशिश विफल |
| 47 | चुनी हुई दिल्ली सरकार के साथ प्रशासनिक शक्तियों पर लगातार टकराव | संघवाद | उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच निरंतर गतिरोध |
| 48 | दिल्ली सेवा मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए अध्यादेश लाना | संस्थागत संतुलन | निर्वाचित सरकार के अधिकारों को सीमित करने का कदम |
| 49 | संसदीय स्थायी समितियों की समीक्षा के बिना महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करना | विधायी प्रक्रिया | कानूनों की संसदीय जांच के प्रतिशत में भारी गिरावट |
| 50 | 2023 के शीतकालीन सत्र में 146 विपक्षी सांसदों का एक साथ निलंबन | संसदीय लोकतंत्र | विपक्ष-विहीन संसद में प्रमुख आपराधिक कानूनों का पारित होना |
| 51 | सेना में नियमित भर्ती रोककर चार साल की अल्पकालिक 'अग्निपथ' योजना लागू करना | रक्षा सुधार | युवाओं में भविष्य और पेंशन को लेकर असंतोष |
| 52 | अग्निवीर भर्ती योजना को लेकर देशभर में हिंसक विरोध-प्रदर्शन और अनिश्चितता | राष्ट्रीय सुरक्षा | रेजिमेंटल व्यवस्था और सैन्य मनोबल पर उठे सवाल |
| 53 | 2023 में जंतर-मंतर पर महिला पहलवानों के प्रदर्शन से निपटने का असंवेदनशील रवैया | खेल व समाज | अंतरराष्ट्रीय पदक विजेताओं की अनदेखी का आरोप |
| 54 | बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ महिला पहलवानों की शिकायतों पर पुलिस कार्रवाई में देरी | महिला सुरक्षा | सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद एफआईआर दर्ज होना |
| 55 | भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) में अनिवार्य आंतरिक शिकायत समिति (ICC) का न होना | कानूनी अनुपालन | पोश (POSH) कानून के बुनियादी प्रावधानों की विफलता |
| 56 | मई 2023 से मणिपुर में भड़की भीषण जातीय हिंसा पर प्रभावी नियंत्रण की कमी | आंतरिक सुरक्षा | मैतेई और कुकी समुदायों के बीच व्यापक विभाजन |
| 57 | मणिपुर में महीनों तक हिंसा, आगजनी और हत्याओं का अनियंत्रित दौर चलना | शासन व्यवस्था | राज्य सरकार की विफलता और कानून-व्यवस्था का चरमराना |
| 58 | मणिपुर में महीनों तक लगातार इंटरनेट बंद रखने से आम जनजीवन ठप होना | नागरिक जीवन | छात्रों, व्यापारियों और स्वास्थ्य सेवाओं को भारी नुकसान |
| 59 | मणिपुर संकट पर केंद्र सरकार के शीर्ष नेतृत्व का बेहद देर से और सीमित बयान | राजनीतिक नेतृत्व | संसद और सार्वजनिक मंचों पर मुद्दे की उपेक्षा का आरोप |
| 60 | मई 2020 में पूर्वी लद्दाख सीमा पर चीनी घुसपैठ को लेकर खुफिया तैयारी पर सवाल | सीमा सुरक्षा | वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थिति का पूर्व आकलन न होना |
| 61 | गलवान झड़प के बाद भारत-चीन सीमा पर वर्षों तक चला लंबा सैन्य गतिरोध | रक्षा नीति | भारी संख्या में सैनिकों की तैनाती का आर्थिक व सामरिक बोझ |
| 62 | लद्दाख में पारंपरिक गश्त बिंदुओं पर 'बफर ज़ोन' बनने से भारतीय सेना की गश्त सीमित होना | संप्रभुता | भारतीय गश्त वाले क्षेत्रों में सैनिकों के जाने पर रोक |
| 63 | लद्दाख में चीनी निर्माण और अतिक्रमण की वास्तविक स्थिति पर सार्वजनिक पारदर्शिता का अभाव | सूचना का अधिकार | संसद में विस्तृत चर्चा और आधिकारिक श्वेतपत्र की अनुपस्थिति |
| 64 | 'आत्मनिर्भर भारत' के दावों के बावजूद चीनी आयातों पर भारतीय उद्योगों की बढ़ती निर्भरता | व्यापार नीति | एपीआई, सौर पैनल और इलेक्ट्रॉनिक्स में चीन पर निर्भरता |
| 65 | भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार घाटे का रिकॉर्ड स्तरों (100 अरब डॉलर के पार) पर पहुंचना | अर्थव्यवस्था | आयात में तीव्र वृद्धि और निर्यात में कमी |
| 66 | पाकिस्तान को लेकर नीति में निरंतरता का अभाव (अचानक बातचीत और फिर पूर्ण संवादहीनता) | विदेश नीति | स्पष्ट और सुसंगत कूटनीतिक रोडमैप की कमी |
| 67 | दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री का अचानक बिना पूर्व-घोषणा के लाहौर दौरा | कूटनीति | व्यक्तिगत कूटनीति के कुछ दिन बाद पठानकोट हमला हुआ |
| 68 | पठानकोट एयरबेस हमले की जांच के लिए पाकिस्तानी जेआईटी (JIT) को एयरबेस में प्रवेश | राष्ट्रीय सुरक्षा | संवेदनशील सैन्य ठिकानों पर विरोधी देश की जांच टीम को अनुमति |
| 69 | पाकिस्तान के साथ आतंकवाद और सीमा पार तनाव पर कोई स्थायी समाधान न ढूंढ पाना | क्षेत्रीय कूटनीति | द्विपक्षीय बातचीत का औपचारिक ढांचा पूरी तरह ध्वस्त |
| 70 | राफेल लड़ाकू विमान खरीद प्रक्रिया और ऑफसेट साझेदार चयन पर उपजा बड़ा विवाद | रक्षा खरीद | 126 की जगह 36 विमान खरीदने के फैसले पर सवाल |
| 71 | 'मेक इन इंडिया' की महत्वाकांक्षा और विनिर्माण में वास्तविक नौकरियों के बीच भारी खाई | औद्योगिक नीति | विनिर्माण का जीडीपी में अनुपात 25% तक ले जाने का लक्ष्य अधूरा |
| 72 | शिक्षित युवाओं में उच्च बेरोज़गारी दर का लंबे समय तक बने रहना | जनसांख्यिकी | डिग्री धारक युवाओं में उपयुक्त नौकरियों का अभाव |
| 73 | आर्थिक असमानता में वृद्धि; शीर्ष धनकुबेरों और आम जनता के बीच बढ़ती खाई | आर्थिक न्याय | जीडीपी वृद्धि का लाभ समाज के निचले तबके तक सीमित पहुंचना |
| 74 | नीट-यूजी और यूजीसी-नेट जैसी शीर्ष राष्ट्रीय परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक और गड़बड़ियां | शिक्षा प्रणाली | राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की विश्वसनीयता पर संकट |
| 75 | 2021 में प्रस्तावित नियमित दशकीय जनगणना को अनिश्चितकाल के लिए टालते जाना | सांख्यिकी ढांचा | विश्वसनीय जनसांख्यिकीय और सामाजिक आंकड़ों का अभाव |
| 76 | प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में शक्तियों का अत्यधिक केंद्रीकरण और कैबिनेट की घटती भूमिका | प्रशासनिक ढांचा | मंत्रालयों की स्वायत्तता और सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया में गिरावट |
लोकतांत्रिक शासन में पूर्ण बहुमत का मिलना स्थिरता का प्रतीक ज़रूर है, लेकिन यह संस्थागत जांच-पड़ताल और नीतियों की जवाबदेही का विकल्प नहीं बन सकता। पिछले दशक के नीतिगत नतीजों की यह पड़ताल स्पष्ट करती है कि स्थायी प्रगति केवल नारों और तात्कालिक घोषणाओं से नहीं, बल्कि संस्थागत संतुलन, पारदर्शी विमर्श और ज़मीनी प्राथमिकताओं के सम्मान से ही संभव है।

