बारानिका एलंगोवन: हवा में उड़ने की जिद और भारतीय पोल वॉल्ट का नया इतिहास
नागोया के मिज़ूहो स्टेडियम में ऐतिहासिक क्षण
25 सितंबर 2026 की शाम भारतीय एथलेटिक्स के लिए एक ऐसे अध्याय का गवाह बनी, जिसकी कल्पना कुछ वर्षों पहले तक खेल पंडितों के लिए भी बेहद मुश्किल थी। जापान के नागोया स्थित अत्याधुनिक मिज़ूहो पार्क एथलेटिक स्टेडियम में तनाव और भारी उम्मीदों के बीच, 29 वर्षीय भारतीय एथलीट बारानिका एलंगोवन ने अपने हाथ में पकड़े फाइबरग्लास पोल के सहारे खुद को हवा में उछाला। उनका 4.15 मीटर का यह सफल प्रयास केवल एक खेल स्पर्धा का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह एशियाई खेलों के इतिहास में भारत के लिए पोल वॉल्ट (चाहे पुरुष वर्ग हो या महिला वर्ग) में आया पहला पदक था। स्टेडियम की तेज फ्लडलाइट्स की रोशनी में जब बारानिका ने बार को पार कर मैट पर सुरक्षित लैंडिंग की, तो वह केवल एक व्यक्तिगत जीत नहीं थी, बल्कि एक पूरे देश का इस जटिल खेल विधा में वैश्विक स्तर पर प्रवेश का औपचारिक उद्घोष था। इस बेहद कड़े मुकाबले में जापान की मिसाकी मोरोता ने 4.55 मीटर की अपनी व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ छलांग के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया, जबकि चीन की निउ चुंगे ने 4.50 मीटर के साथ रजत पदक हासिल किया।
कुथालम के खेतों से रनवे की दूरी
तमिलनाडु के मयिलाडुथुरई जिले के एक छोटे से कृषि प्रधान गांव कुथालम में 3 फरवरी 1997 को जन्मी बारानिका की जड़ें पूरी तरह से ग्रामीण भारत की मिट्टी से जुड़ी हुई थीं। उनके पिता एलंगोवन एक किसान हैं और माता रानी एक गृहिणी। एक ऐसे परिवेश में जहां खेल को अक्सर शिक्षा के बाद एक साधारण शगल से ज्यादा नहीं माना जाता, वहां से निकलकर एक अंतरराष्ट्रीय एथलीट बनने का यह सफर असाधारण है। स्कूली दिनों में बारानिका ने अपनी एथलेटिक क्षमताओं का प्रदर्शन स्प्रिंट, लॉन्ग जंप और ट्रिपल जंप में किया था। दिलचस्प बात यह है कि पोल वॉल्ट जैसे तकनीकी रूप से बेहद जटिल खेल में उनका प्रवेश किसी पूर्व निर्धारित योजना के तहत नहीं, बल्कि एक संयोग के रूप में हुआ था। चेन्नई के प्रतिष्ठित एथिरज कॉलेज फॉर वुमेन में अपनी उच्च शिक्षा के दौरान वे एक ट्रिपल जंप कोच की तलाश कर रही थीं। इसी दौरान उनकी मुलाकात पोल वॉल्ट के अनुभवी कोच मिलबर बर्ट्रेंड रसेल (मिलबर रसेल) से हुई, जो उनके एथलेटिक करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ。
'हवा में उड़ने' का सपना और सामाजिक बेड़ियां
पोल वॉल्ट एक ऐसा खेल है जिसमें फर्राटा धावक जैसी गति, जिम्नास्ट जैसी चपलता और एक भारोत्तोलक जैसी ऊपरी शरीर की ताकत की आवश्यकता होती है। शुरुआती दिनों में यह सफर बारानिका के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था। महज 42 से 45 किलो वजन वाली इस युवा लड़की के लिए फाइबरग्लास का वह लंबा और भारी पोल उठाना और उसे नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती थी। शुरुआत में वजन और तकनीक के असंतुलन के कारण उन्होंने इस खेल को पूरी तरह से छोड़ने का मन बना लिया था। लेकिन एक दिन अभ्यास के दौरान जब उन्होंने वरिष्ठ खिलाड़ियों को उस भारी पोल के सहारे गुरुत्वाकर्षण को मात देते और हवा में उड़ते हुए देखा, तो उनके भीतर एक नई जिद ने जन्म लिया। उन्होंने उसी क्षण तय किया कि "मुझे भी हवा में उड़ना है।"
हालांकि, यह उड़ान सिर्फ गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ नहीं थी, बल्कि उन सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ भी थी जो ग्रामीण भारत में लड़कियों के खेल को लेकर आज भी मौजूद हैं। जब बारानिका को खेल के दौरान चोट लगी, तो गांव के पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने उनके माता-पिता को ताने देना शुरू कर दिया। यह सवाल बार-बार उठाया गया कि "एक लड़की को पोल वॉल्ट जैसे खतरनाक और लड़कों वाले खेल में क्यों डाल रहे हो? अगर उसके हाथ-पैर टूट गए या कुछ गंभीर हो गया, तो उससे शादी कौन करेगा?" ऐसे हतोत्साहित करने वाले माहौल के बावजूद, बारानिका और उनके परिवार ने इन सामाजिक बेड़ियों को अनसुना कर दिया और अपने खेल पर ध्यान केंद्रित रखा।
घुटने की गंभीर चोट और वापसी का संघर्ष
पोल वॉल्ट जितना देखने में रोमांचक लगता है, एथलीट के लिए यह उतना ही खतरनाक भी हो सकता है। साल 2019 में एक प्रतियोगिता के दौरान खराब और पुरानी लैंडिंग मैट के कारण बारानिका को अपने दाहिने घुटने के एसीएल (एंटीरियर क्रूसिएट लिगामेंट) और मेनिस्कस में बेहद गंभीर चोट का सामना करना पड़ा। एक जम्पर के लिए घुटने की चोट अक्सर करियर खत्म करने वाली साबित होती है, क्योंकि टेक-ऑफ के समय शरीर का पूरा जोर और गतिज ऊर्जा इसी हिस्से पर केंद्रित होती है। इस चोट के बाद हुई सर्जरी और उसकी रिहैबिलिटेशन प्रक्रिया लंबी, बेहद कष्टदायी और मानसिक रूप से तोड़ देने वाली थी। कई साल केवल अपनी खोई हुई शारीरिक ताकत को वापस पाने और लैंडिंग के उस ट्रॉमा से मानसिक रूप से उबरने में बीत गए। खेल विज्ञान के विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी चोटों के बाद एथलीटों में 'फियर ऑफ जंपिंग' आ जाता है, जिसे पार पाना सबसे मुश्किल होता है। यह वह दौर था जब कई होनहार एथलीट हार मान लेते हैं, लेकिन बारानिका ने धैर्य नहीं खोया और कदम-दर-कदम खुद को फिर से तैयार किया।
हाई परफॉर्मेंस सेंटर और रिकॉर्ड्स की झड़ी
साल 2023 उनके करियर का एक ऐसा निर्णायक मोड़ साबित हुआ जिसने उनकी क्षमताओं को विश्व स्तर के लिए निखारा। वे भुवनेश्वर स्थित रिलायंस फाउंडेशन हाई परफॉर्मेंस सेंटर पहुंचीं। यहां उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर की बुनियादी सुविधाएं, स्पोर्ट्स साइंस और बायोमैकेनिक्स का समर्थन, अत्याधुनिक रिकवरी सिस्टम और बेहतरीन तकनीकी कोचिंग मिली। इस वैज्ञानिक और संस्थागत दृष्टिकोण ने उनके प्रशिक्षण की खामियों को दूर किया और उनकी प्रगति को तेज कर दिया।
साल 2026 उनके इसी अथक समर्पण का परिणाम लेकर आया। मार्च महीने में आयोजित नेशनल इंडोर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने 4.22 मीटर की शानदार छलांग लगाई और रोजी मीना पॉलराज के 4.21 मीटर के पिछले राष्ट्रीय रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया। उनकी यह फॉर्म यहीं नहीं रुकी; मई में आयोजित भारतीय इंडोर ओपन में उन्होंने अपने ही रिकॉर्ड को सुधारते हुए 4.23 मीटर का नया कीर्तिमान स्थापित किया। लगातार राष्ट्रीय स्तर पर खिताबी जीत और इन उत्कृष्ट प्रदर्शनों के दम पर ही वे एशियाई खेलों के कठिन क्वालिफिकेशन मानक को पार करने में सफल रहीं।
नागोया का रोमांचक फाइनल और काउंटबैक का फैसला
एशियाई खेलों के फाइनल मुकाबले में स्टेडियम का दबाव अपने चरम पर था, लेकिन बारानिका ने अपने रनवे पर गजब का आत्मविश्वास दिखाया। उन्होंने 3.85 मीटर और 4.00 मीटर की शुरुआती ऊंचाइयों को बिना किसी फाउल के अपने पहले ही प्रयास में आसानी से पार कर लिया। 4.15 मीटर की ऊंचाई पर उन्हें अपने दूसरे प्रयास में सफलता मिली, जिसने उन्हें मेडल की रेस में मजबूती से खड़ा कर दिया।
आगे बढ़ते हुए 4.25 मीटर के उनके तीनों प्रयास विफल रहे, लेकिन तब तक उनका ऐतिहासिक पदक पक्का हो चुका था। तकनीकी रूप से यह मुकाबला बेहद रोमांचक रहा क्योंकि कजाखस्तान की प्रतिभाशाली एथलीट पोलीना इवानोवा ने भी 4.15 मीटर की ऊंचाई पार की थी और उन्होंने भी 4.25 मीटर के तीनों प्रयास विफल कर दिए थे। एथलेटिक्स के 'काउंटबैक' नियमों के अनुसार, जब दोनों खिलाड़ियों के पिछली ऊंचाइयों पर सफल और विफल प्रयासों का रिकॉर्ड बिल्कुल समान पाया गया, तो निर्णायक मंडल ने दोनों को संयुक्त रूप से कांस्य पदक का विजेता घोषित किया।
भारतीय एथलेटिक्स में महिलाओं के लिए एक नया सवेरा
बारानिका एलंगोवन का यह पदक महज एक व्यक्तिगत खेल उपलब्धि से कहीं बढ़कर है। भारतीय पोल वॉल्ट हमेशा से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अनदेखा खेल रहा है, जिसमें बुनियादी ढांचे की भारी कमी रही है। इस कांस्य पदक ने आधिकारिक तौर पर यह साबित कर दिया है कि अगर सही संस्थागत समर्थन, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और अटूट लगन हो, तो ग्रामीण परिवेश से निकलकर, गंभीर चोटों से जूझते हुए भी दुनिया के सबसे बड़े मंचों पर परचम लहराया जा सकता है। वे एशियाई खेलों, कॉमनवेल्थ गेम्स या ओलंपिक जैसे प्रमुख मल्टी-स्पोर्ट्स आयोजनों में पोल वॉल्ट का पदक जीतने वाली पहली भारतीय एथलीट बन गई हैं। अपनी इस ऐतिहासिक जीत के बाद बारानिका ने स्पष्ट किया कि वे नागोया में 4.30 मीटर का लक्ष्य लेकर आई थीं, इसलिए वे अपने इस प्रदर्शन से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। यह रचनात्मक असंतोष उनके भीतर की चैंपियन मानसिकता को दर्शाता है। उन्होंने भावुक होते हुए अपना यह बहुमूल्य पदक अपने कोच मिलबर रसेल को समर्पित किया, जिन्होंने वर्षों तक हर उतार-चढ़ाव में उन पर भरोसा बनाए रखा।
बारानिका एलंगोवन ने नागोया की सरजमीं पर केवल एक फाइबरग्लास पोल के सहारे ऊंचाई को ही पार नहीं किया है, बल्कि उन्होंने भारतीय एथलेटिक्स के ऊपर बनी एक अदृश्य रूढ़िवादी छत को भी हमेशा के लिए तोड़ दिया है। उनकी यह सफलता उन तमाम युवा लड़कियों के लिए एक प्रत्यक्ष मिसाल है, जिन्हें समाज जोखिम भरे खेलों से दूर रहने की नसीहत देता है; अब कोचिंग सिस्टम और परिवार के समर्थन के साथ निगाहें और भी ऊंची छलांगों और बड़े मंचों पर टिकी हैं, क्योंकि इतिहास की किताब का पहला पन्ना तो लिखा ही जा चुका है।
