ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: विकास की महत्वाकांक्षा या पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों का अभूतपूर्व हनन?
प्रस्तावना: अंडमान-निकोबार की अनछुई सुंदरता पर गहराता संकट
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की अनछुई प्राकृतिक सुंदरता, सदियों पुराने घने वर्षावन और शीशे की तरह पारदर्शी नीले समंदर सिर्फ पर्यटन के आकर्षण नहीं हैं; वे भारत की एक अनमोल पारिस्थितिक धरोहर हैं। हाल ही में इस अति-संवेदनशील क्षेत्र में प्रस्तावित 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' को लेकर गंभीर और चिंताजनक तथ्य सामने आए हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा साझा किए गए एक विस्तृत विवरण, स्थानीय लोगों के साथ उनकी बातचीत और जमीनी स्तर के पर्यावरण विशेषज्ञों की रिपोर्ट ने इस विशालकाय बुनियादी ढांचा परियोजना की असलियत पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं。
"समुद्र और जंगल इंसान से अलग नहीं हैं, बल्कि वे हमारे ही अस्तित्व का अटूट हिस्सा हैं।"
कॉलेज के दिनों से ही एक प्रशिक्षित एडवांस स्कूबा डाइवर (Dive Master) रहे राहुल गांधी के अनुसार, समुद्र और जंगल इंसान से अलग नहीं हैं, बल्कि वे हमारे ही अस्तित्व का अटूट हिस्सा हैं। जब आदिवासी समुदाय के लोगों ने उनसे संपर्क कर निकोबार में हो रहे पारिस्थितिक विनाश को देखने का आग्रह किया, तो उन्होंने खुद वहां जाकर जमीनी हकीकत का जायजा लिया। कैमरे पर दर्ज वहां के साफ नीले पानी और घने जंगलों के दृश्य इस बात की गवाही देते हैं कि यह केवल पेड़ों की कटाई तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि एक पूरी सभ्यता और पारिस्थितिकी तंत्र के मिटने का संकट है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का विशाल दायरा और विनाशकारी प्रभाव
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट कोई आम विकास या इंफ्रास्ट्रक्चर योजना नहीं है। इसके तहत लगभग 161 वर्ग किलोमीटर के अति-संवेदनशील और घने जंगलों वाले इलाके को पूरी तरह से कंक्रीट में तब्दील करने की योजना है। इस क्षेत्रफल की विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह भारत की राजधानी नई दिल्ली के आकार का लगभग चार गुना है।
इस परियोजना को लागू करने के लिए जिस स्तर पर वनों की कटाई प्रस्तावित है, वह डराने वाली है। एक तरफ सरकारी दस्तावेजों में यह दावा किया जा रहा है कि इन जंगलों में प्रति हेक्टेयर केवल 145 पेड़ हैं, वहीं पर्यावरण विशेषज्ञों और स्वतंत्र आकलनों के अनुसार यह घने वर्षावन का क्षेत्र है, जहां कुछ ही मीटर के दायरे में सैकड़ों पेड़ मौजूद हैं। इस प्रोजेक्ट के लिए अनुमानित तौर पर 1.5 करोड़ (डेढ़ करोड़) से अधिक प्राचीन पेड़ों को काटा जाना है। आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो एक व्यस्क पेड़ की अनुमानित कीमत लगभग तीन लाख रुपये आंकी जाती है। करोड़ों पेड़ों की इस अंधाधुंध कटाई से अरबों डॉलर की लकड़ियों का जो खेल होगा, वह पर्यावरण के लिए एक ऐसा नुकसान है जिसकी भरपाई आने वाली कई सदियां नहीं कर पाएंगी।
राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क बनाम कॉर्पोरेट और व्यावसायिक हितों के आरोप
इस पूरे प्रोजेक्ट के बचाव में सबसे बड़ा तर्क राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक आवश्यकता का दिया जाता है। सरकार का पक्ष है कि हिंद महासागर में बढ़ती सामरिक चुनौतियों को देखते हुए नौसेना बेस 'आईएनएस बाज़ (INS Baaz)' का विस्तार और एक बड़े ट्रांसशिपमेंट पोर्ट का निर्माण देश की सुरक्षा के लिए अपरिहार्य है。
तथ्यात्मक रूप से देखें तो सेना के ठिकानों का आधुनिकीकरण और विस्तार निर्विवाद रूप से आवश्यक है। कांग्रेस पार्टी सहित तमाम विपक्षी दल भी आईएनएस बाज़ के विस्तार का पूर्ण समर्थन करते हैं। आधिकारिक तौर पर पिछले पांच वर्षों से नौसेना खुद इस विस्तार की मांग कर रही है। लेकिन सबसे बड़ा और तार्किक सवाल यह उठता है कि एक सैन्य बेस के विस्तार के लिए इस स्तर पर प्राचीन वर्षावनों को नष्ट करने की आवश्यकता क्यों है, जबकि तटीय क्षेत्रों में इसके लिए पर्याप्त खाली जमीन पहले से उपलब्ध है?
इस विवाद का दूसरा सबसे संदिग्ध पहलू इस प्रोजेक्ट में शामिल व्यावसायिक निर्माण है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर पास किए जा रहे इस प्रोजेक्ट में विशालकाय होटलों, कैसीनो (Casinos) और बड़े पैमाने पर रियल एस्टेट संपत्तियों का निर्माण शामिल है। सैन्य सुरक्षा और कैसीनो के निर्माण के बीच कोई भी तार्किक या रणनीतिक संबंध स्थापित नहीं होता। राहुल गांधी ने स्पष्ट तौर पर यह राजनीतिक आरोप लगाया है कि सुरक्षा बलों की आड़ में असल में एक विशेष उद्योगपति समूह (अडानी समूह) के व्यावसायिक और रियल एस्टेट हितों को साधा जा रहा है। इसके अलावा, निकोबार में एक नए ट्रांसशिपमेंट पोर्ट की प्रासंगिकता पर भी सवाल हैं, क्योंकि भारत की मुख्य भूमि (केरल) में पहले से ही एक बड़ा पोर्ट विकसित किया जा रहा है。
आदिवासी अधिकारों और वन अधिकार कानून (FRA) की अनदेखी
निकोबार द्वीप मुख्य रूप से दो समुदायों का निवास स्थान है। पहले वे मूल आदिवासी (जैसे शोम्पेन और निकोबारी), जो सदियों से इन जंगलों के वास्तविक और कानूनी मालिक हैं। दूसरे वे पूर्व सैनिक और उनके परिवार (सेटलर्स), जिन्हें दशकों पहले भारत सरकार ने सामरिक उपस्थिति दर्ज कराने के उद्देश्य से मुख्य भूमि से लाकर वहां बसाया था。
कानूनी रूप से, वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act - FRA) के तहत किसी भी वन भूमि के अधिग्रहण या डायवर्जन से पहले स्थानीय आदिवासी ग्राम सभाओं की सहमति अनिवार्य है। इस मामले में पर्यावरण अधिवक्ताओं की जांच से पता चलता है कि FRA की प्रक्रिया का गंभीर रूप से दुरुपयोग और उल्लंघन किया गया है। वन भूमि के डायवर्जन के लिए जो ग्राम सभाएं आयोजित की गईं, वे कथित तौर पर 'लक्ष्मी नगर' और 'शास्त्री नगर' जैसे उन गांवों में हुईं जहां मुख्य रूप से गैर-आदिवासी 'सेटलर्स' रहते हैं। जिन आदिवासी समुदायों का इन जंगलों पर वास्तविक अधिकार है, उन्हें इस निर्णय प्रक्रिया से पूरी तरह हाशिए पर रखा गया。
साल 2018 में नीति आयोग (NITI Aayog) के तत्वावधान में बनी एक उप-समिति के दस्तावेजों और शोधकर्ताओं के ऑन-कैमरा साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि शोम्पेन (Shompen) जनजाति के लोगों ने किसी भी तरह के बाहरी हस्तक्षेप का कड़ा विरोध किया था। वीडियो साक्ष्यों में उन्होंने स्पष्ट रूप से अपील की है कि उनके जंगलों में बाहरी लोगों या पर्यटन का प्रवेश न हो, क्योंकि यही जंगल उनके बच्चों के भरण-पोषण का एकमात्र स्रोत हैं। इसके बावजूद, गुमराह करके और बिना पूर्ण जानकारी दिए उनसे अनापत्ति प्रमाण पत्रों (NOCs) पर हस्ताक्षर करवाने के संगीन दावे सामने आए हैं। यह बिना उचित मुआवजे और सहमति के, एक पूरी सभ्यता की जमीन छीनने का कृत्य माना जा रहा है。
प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) को अपूरणीय क्षति और कानूनी विरोधाभास
जंगलों की कटाई के अलावा, इस महा-परियोजना का सबसे विनाशकारी पारिस्थितिक प्रभाव निकोबार की प्रवाल भित्तियों (कोरल रीफ्स) पर पड़ने वाला है। समुद्री जीव विज्ञानियों ने एक बेहद चिंताजनक तथ्य उजागर किया है कि 2020 और 2021 के आधिकारिक नक्शों में कथित तौर पर बदलाव किए गए हैं ताकि यह दिखाया जा सके कि प्रोजेक्ट वाले क्षेत्र में कोई महत्वपूर्ण कोरल मौजूद ही नहीं है। जबकि वास्तविकता यह है कि वहां 'फ्रिंजिंग रीफ्स' (Fringing Reefs) बड़ी संख्या में मौजूद हैं, जो उथले पानी (1 फीट) से लेकर 25 मीटर की गहराई तक फैली हुई हैं。
कानूनी दृष्टिकोण से यह एक अत्यंत गंभीर मामला है। भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (Wildlife Protection Act) के तहत कोरल रीफ्स को 'अनुसूची 1 (Schedule 1)' में रखा गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि कानूनी तौर पर कोरल को वही उच्चतम संरक्षण प्राप्त है जो भारत में बाघों (Tigers) को मिला हुआ है। ऐसे में, निकोबार में इन कोरल रीफ्स को नष्ट करना, कानूनी और पारिस्थितिक रूप से, भारत में सैकड़ों बाघों की हत्या करने के समान अपराध है। ये कोरल केवल रंग-बिरंगी मछलियों का घर नहीं हैं, बल्कि ये दुर्लभ और स्थानिक (Endemic) प्रजातियों का आश्रय होने के साथ-साथ एक बहुत बड़ा कार्बन सिंक (Carbon Sink) भी हैं। इन्हें नष्ट करने का मतलब है भारत के एक बड़े जैविक संसाधन को हमेशा के लिए समाप्त कर देना。
"निकोबार में इन कोरल रीफ्स को नष्ट करना, कानूनी और पारिस्थितिक रूप से, भारत में सैकड़ों बाघों की हत्या करने के समान अपराध है।"
विकास का सही और संवेदनशील मॉडल क्या होना चाहिए?
इस पूरे विमर्श में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विकास का अर्थ प्रकृति का अंधाधुंध दोहन नहीं हो सकता। पश्चिमी दर्शन में समुद्र और जंगल अक्सर ऐसी चीजें माने जाते हैं जिन्हें जीता जाना है या जिनका व्यावसायिक इस्तेमाल होना है। लेकिन भारतीय और आदिवासी दर्शन में, मानव और प्रकृति एक ही इकाई हैं। आदिवासियों का मानना है कि प्रकृति से कटने का मतलब खुद से कटना है। राहुल गांधी से बातचीत में एक आदिवासी महिला ने बेहद मार्मिक शब्दों में कहा था—
"जब वे पेड़ काटते हैं, तो लगता है जैसे वे मेरा अपना पेट काट रहे हों।"
इस क्षेत्र में विकास की आवश्यकता से किसी को इनकार नहीं है। वहां रहने वाले 'सेटलर्स' समुदाय लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। लेकिन वह विकास होटलों और कैसीनो के रूप में नहीं, बल्कि 'पारिस्थितिक रूप से संतुलित पर्यटन (Ecologically Balanced Tourism)' के रूप में होना चाहिए। सेना को अपनी आवश्यकता के अनुसार सर्वोत्कृष्ट सुविधाएं मिलनी चाहिए, लेकिन इसके लिए जंगलों और समुद्र की बलि देना कतई जरूरी नहीं है。
भले ही पर्यावरण को हो रहे इस बड़े नुकसान का असर आज तुरंत महसूस न हो, लेकिन आने वाले दशकों में हमारी भावी पीढ़ियों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट एक ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे राष्ट्रीय सुरक्षा के आवरण में अंधाधुंध व्यावसायीकरण, प्रकृति और आदिवासियों के अस्तित्व पर भारी पड़ सकता है। यह समय रहते यह तय करने का क्षण है कि विकास की अंधी दौड़ में कहीं हम अपनी सबसे अनमोल प्राकृतिक धरोहरों को हमेशा के लिए तो नहीं खो रहे हैं。

