निर्वाचन आयोग में अभूतपूर्व दरार: 14 आंतरिक आपत्तियों, SIR विवाद और नियुक्ति कानून के बीच लोकतंत्र का बड़ा इम्तिहान
भारतीय लोकतंत्र के सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले स्तंभ, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर से उभरी एक जांच रिपोर्ट ने देश के नीतिगत और राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। द इंडियन एक्सप्रेस द्वारा उजागर किए गए दस्तावेजों के अनुसार, आयोग के दो सेवारत चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले दस महीनों में कम से कम चौदह बार लिखित असहमति और औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई हैं। इन पत्रों का मूल सार यह है कि आयोग के कई नीतिगत, कानूनी और प्रशासनिक निर्णय 'पूर्ण आयोग' (फुल कमीशन) की सहमति या जानकारी के बिना ही लागू किए जा रहे थे। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था के भीतर इस स्तर की दरार आधुनिक भारतीय चुनावी इतिहास में विरली ही देखने को मिली है।
'पूर्ण आयोग' की परंपरा और फाइलों में दर्ज आंतरिक असंतोष
संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का असाधारण अधिकार सौंपता है। टी.एन. शेषन के दौर के बाद जब 1993 में आयोग को स्थायी रूप से तीन सदस्यीय निकाय का रूप दिया गया, तब से यह स्थापित व्यवस्था रही है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों का दर्जा समान है। आयोग के फैसले सर्वसम्मति से होते हैं और मतभेद की स्थिति में बहुमत मान्य होता है।
ताजा खुलासे दर्शाते हैं कि नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच यह परंपरा कागजों तक ही सीमित रह गई। दस्तावेजों के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने बार-बार रेखांकित किया कि अहम फाइलें उनके पास विचार के लिए भेजी ही नहीं गईं, या फिर फैसले पहले ले लिए गए और बाद में केवल औपचारिकता पूरी करने की कोशिश की गई। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक ही दिन में चार-चार असहमति नोट दर्ज किए गए। आंतरिक संचार में "अनधिकृत", "नियमविरुद्ध" और "गैर-कानूनी" जैसे कड़े शब्दों का इस्तेमाल यह साफ करता है कि यह मतभेद सामान्य प्रशासनिक चर्चा का हिस्सा नहीं, बल्कि संस्थागत नियंत्रण की गहरी खींचतान थी.
नियुक्ति का बदला हुआ ढांचा और कार्यपालिका का संख्याबल
इस संस्थागत टकराव की पृष्ठभूमि को समझने के लिए साल 2023 के घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि चुनाव आयुक्तों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) होने चाहिए। हालांकि, न्यायालय ने यह व्यवस्था संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक के लिए दी थी।
संसद ने दिसंबर 2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 पारित किया। इस कानून में मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत एक कैबिनेट मंत्री को चयन समिति में शामिल कर दिया गया। इसके चलते समिति में कार्यपालिका को 2:1 का स्वाभाविक बहुमत मिल गया।
इसी प्रक्रिया के तहत मार्च 2024 में सुखबीर सिंह संधू और ज्ञानेश कुमार चुनाव आयुक्त बने। इसके बाद 19 फरवरी 2025 को ज्ञानेश कुमार नए कानून के तहत नियुक्त होने वाले पहले मुख्य चुनाव आयुक्त बने, जबकि विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त के पद पर लाया गया। आज इस कानून की संवैधानिक वैधता एक बार फिर शीर्ष अदालत के विचाराधीन है। 23 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने इस अधिनियम की स्वतंत्रता को लेकर विभाजित फैसला सुनाते हुए मामले को बड़ी संविधान पीठ के पास भेज दिया है, जिसमें जस्टिस दीपांकर दत्ता ने मौजूदा चयन प्रक्रिया से संस्था की स्वायत्तता प्रभावित होने की गंभीर चिंता जताई है।
'विशेष गहन पुनरीक्षण' और 13 करोड़ नामों का संवेदनशील सवाल
आंतरिक विवाद को सबसे ज्यादा हवा दी जून 2025 में बिहार से शुरू किए गए 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (Special Intensive Revision - SIR) ने। आयोग का आधिकारिक उद्देश्य मतदाता सूचियों में मौजूद मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित, डुप्लिकेट और अयोग्य प्रविष्टियों को हटाकर सूची को पूरी तरह त्रुटिहीन बनाना था। बाद में इस अभियान का विस्तार 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक कर दिया गया।
आधिकारिक ड्राफ्ट सूचियों के संकलित आंकड़ों के मुताबिक, इस व्यापक अभियान के तहत अब तक 13 करोड़ से अधिक नाम मतदाता सूचियों से हटाए जा चुके हैं। एक तरफ जहां प्रशासनिक स्तर पर इसे चुनावी शुचिता के लिए जरूरी शुद्धिकरण बताया जा रहा है, वहीं विपक्षी दल इसे पारदर्शी प्रक्रिया के अभाव में मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने का व्यवस्थित प्रयास बता रहे हैं। जांच से यह स्पष्ट होता है कि दोनों चुनाव आयुक्तों की चिंताएं इस बात को लेकर थीं कि इतने विशाल पैमाने पर नाम हटाने और जोड़ने की व्यावहारिक एसओपी (मानक संचालन प्रक्रिया) उनके संज्ञान में लाए बिना ही मैदानी अधिकारियों को जारी कर दी गई थी।
वे 14 आपत्तियां: नियमों के उल्लंघन और अपीलों पर तीखे सवाल
दस्तावेजी साक्ष्यों के विश्लेषण से पता चलता है कि दोनों आयुक्तों की आपत्तियां मुख्य रूप से चार संवेदनशील बिंदुओं पर केंद्रित थीं:
- फॉर्म 6 में एकतरफा बदलाव: नए मतदाता के पंजीकरण हेतु भरे जाने वाले फॉर्म 6 में एक नया खंड जोड़ दिया गया, जिसमें आवेदक से पिछली पुनरीक्षण सूची से अपने संबंध का प्रमाण मांगा गया। दोनों आयुक्तों ने दर्ज किया कि निर्वाचन पंजीकरण नियमों में वैधानिक संशोधन किए बिना यह प्रशासनिक बदलाव सीधे तौर पर अनधिकृत और गैर-कानूनी है।
- पश्चिम बंगाल में अपीलों का रहस्य: पश्चिम बंगाल में जब न्यायिक अधिकारियों ने स्थानीय स्तर पर हटाए गए कई मतदाताओं के नामों को सही पाते हुए बहाल करने का आदेश दिया, तो आयोग के नाम पर उन न्यायिक फैसलों के खिलाफ उच्च अदालतों में अपील दायर कर दी गई। दोनों आयुक्तों ने फाइलों पर लिखित सवाल उठाया कि "किसके आदेश से और किसके प्राधिकार के तहत ये अपीलें दाखिल की गईं?", क्योंकि इस विषय पर आयोग की कोई संयुक्त बैठक नहीं हुई थी।
- नाम हटाने और जोड़ने के एकतरफा आदेश: राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEO) को निर्देश जारी करते समय पूर्ण आयोग के अनुमोदन को दरकिनार किया गया, जिससे मतदाता सूची की वैधानिकता पर विधिक सवाल खड़े होने का जोखिम पैदा हुआ।
डेटा का केंद्रीकरण और तकनीकी सुरक्षा पर उठे सवाल
विवाद का एक अत्यंत गंभीर तकनीकी पहलू ERONet और ECINet जैसे डिजिटल पोर्टलों से जुड़ा है। दोनों आयुक्तों ने चेताया कि राज्य और जिला स्तर के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ERO) के कानूनी अधिकारों को दरकिनार कर नई दिल्ली स्थित मुख्यालय से केंद्रीकृत नियंत्रण स्थापित किया जा रहा है। भारतीय चुनाव प्रणाली का मूल आधार विकेंद्रीकृत व्यवस्था है, जहां स्थानीय अधिकारी धरातल पर भौतिक सत्यापन करके नाम जोड़ते या हटाते हैं।
इसके अलावा, आयोग के प्रशासनिक ढांचे में फेरबदल करते हुए एक नए अधिकारी को प्रशासन प्रभाग का प्रभार सौंपने और आईटी सिस्टम की आंतरिक निगरानी की कमान बदलने पर भी भारी असंतोष उभरा। स्थिति इतनी असामान्य हो गई कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को औपचारिक पत्र लिखकर आईटी सुरक्षा, कार्य आवंटन और संस्थागत प्रोटोकॉल के उल्लंघन पर ध्यान देने का आग्रह किया। किसी संवैधानिक आयोग के भीतर से कैबिनेट सचिवालय को इस तरह का पत्र लिखा जाना कार्यप्रणाली में आए गहरे गतिरोध की पुष्टि करता है।
आयोग की 'सर्वसम्मति' की दलील और अनुत्तरित तकनीकी पहलू
इन खुलासों के सार्वजनिक होने के बाद निर्वाचन आयोग ने आधिकारिक प्रतिक्रिया जारी की है। आयोग ने दर्ज किए गए पत्रों, उनकी तारीखों या उनमें व्यक्त की गई आपत्तियों के अस्तित्व को खारिज नहीं किया। आयोग का कहना है कि ECI जैसी बहु-सदस्यीय संस्था में विभिन्न विचारों का आदान-प्रदान और लिखित टिप्पणियां सामान्य विचार-विमर्श की स्वस्थ प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग का औपचारिक दावा है कि पिछले एक वर्ष के दौरान SIR सहित सभी बड़े नीतिगत निर्णय पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से ही लागू किए गए हैं।
तथ्यात्मक दृष्टि से आयोग की इस दलील में कुछ अहम सवालों के जवाब अभी अनुत्तरित हैं। यदि सभी फैसले सर्वसम्मति से थे, तो चुनाव आयुक्तों को फाइलों पर फैसलों को "अवैध" क्यों लिखना पड़ा? इसके अतिरिक्त, मई 2026 से अगस्त 2026 के बीच पूर्ण आयोग की औपचारिक बैठकें क्यों नहीं हुईं, और फॉर्म 6 में संशोधन या पश्चिम बंगाल की अपीलों को अधिकृत करने वाले प्रशासनिक हस्ताक्षर किसके थे? यह स्पष्टता सार्वजनिक डोमेन में आनी बाकी है।
विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया और संवैधानिक साख का प्रश्न
इन खुलासों ने स्वाभाविक रूप से एक बड़ा राजनीतिक बवंडर खड़ा कर दिया है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सीधा हमला बताते हुए आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय से चुनावी तंत्र को एकतरफा ढंग से प्रभावित किया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने राज्यसभा में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव की मांग दोहराई है, जबकि आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी और वामपंथी दलों ने इसे नागरिक अधिकारों का हनन बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से इस पूरे मामले पर स्वतः संज्ञान लेने और SIR प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की अपील की है।
विपक्ष के आरोपों की अपनी राजनीतिक प्रकृति हो सकती है, लेकिन जब संवैधानिक संस्था के अपने ही आंतरिक रिकॉर्ड व्यवस्थागत खामियों की पुष्टि करते हों, तो सवाल केवल राजनीतिक नफे-नुकसान तक सीमित नहीं रह जाता।
चुनाव आयोग केवल एक प्रशासनिक विभाग नहीं, बल्कि भारतीय गणराज्य के जनमत की शुचिता का संरक्षक है। जब आयोग के भीतर ही निर्णय-प्रक्रिया की पारदर्शिता और नियम-सम्मत संचालन पर सवाल उठने लगें, तो मतदाताओं का विश्वास डगमगाना स्वाभाविक है; ऐसे में संस्थागत स्वायत्तता की बहाली और उठाई गई आपत्तियों की स्वतंत्र जांच ही लोकतांत्रिक साख को अक्षुण्ण रख सकती है।



