बैरिकेड पर तिरंगा, आकाशवाणी भवन में धरना और फॉर्म-6 का सच: चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्षी महा-मार्च की पूरी पड़ताल
राजधानी नई दिल्ली का संसद मार्ग और आकाशवाणी भवन परिसर छह अक्टूबर की सुबह से ही एक अभूतपूर्व राजनीतिक टकराव का गवाह बना हुआ है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं और नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े वैधानिक फॉर्म-6 में किए गए बदलावों के विरोध में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के सांसदों ने संसद भवन से निर्वाचन सदन तक ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ निकाला। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इस पूरे आंदोलन के केंद्र में रहे, जिन्होंने पुलिस बैरिकेड पर चढ़कर तिरंगा लहराने से लेकर आकाशवाणी भवन परिसर के भीतर बरगद के पेड़ के नीचे धरना देने तक मोर्चे की कमान संभाले रखी। हालांकि, सड़क पर दिखे इस हाई-वोल्टेज सियासी घटनाक्रम के समानांतर संवैधानिक नियमों, न्यायिक टिप्पणियों और राजनीतिक दावों की एक जटिल परत भी है, जिसकी तथ्यात्मक पड़ताल आवश्यक है।
मकर द्वार से नीति आयोग तक संग्राम और बैरिकेड पर तिरंगा ( video on "X" )
मंगलवार सुबह करीब पौने ग्यारह बजे संसद भवन के मकर द्वार पर विपक्षी सांसदों का जुटना शुरू हुआ। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस के अभिषेक बनर्जी और शिवसेना (उद्धव बालासाहब ठाकरे गुट) के संजय राउत सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने निर्वाचन सदन की ओर पैदल कूच किया। हालांकि, विपक्षी एकजुटता के इस प्रदर्शन से आम आदमी पार्टी ने खुद को अलग रखा और स्पष्ट किया कि वह इस मुद्दे को अपने स्तर पर उठाएगी।
प्रदर्शन के दौरान विपक्षी सांसदों के हाथों में ‘डोंट डिलीट डेमोक्रेसी’ और ‘डेमोक्रेसी नॉट फॉर सेल’ की तख्तियां साफ देखी गईं। कुछ सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ऐसे कटआउट भी ले रखे थे, जिनमें उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गणवेश में दर्शाया गया था। खुद राहुल गांधी के हाथ में एक तख्ती थी जिस पर अंग्रेजी में लिखा था— ‘ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो! टाइम टू रिजाइन’ (ज्ञानेश भाई, अब बस हो गया, इस्तीफा देने का वक्त आ गया है)। यही संदेश उन्होंने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ खाते पर भी साझा किया। निर्वाचन सदन से लगभग तीन सौ मीटर पहले, नीति आयोग और आकाशवाणी भवन के बीच के हिस्से में दिल्ली पुलिस तथा केंद्रीय अर्धसैनिक बलों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा का हवाला देते हुए भारी बैरिकेडिंग कर मार्च को रोक दिया। रास्ता रोके जाने पर राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी पुलिस बैरिकेड के ऊपर चढ़ गए। मौके की तस्वीरों में राहुल गांधी बैरिकेड के शीर्ष पर खड़े होकर हाथ में राष्ट्रीय ध्वज लहराते और नारे लगाते नजर आए।
पुलिस बस से अचानक वापसी और आकाशवाणी भवन में अनियोजित धरना (Video on "X")
दोपहर बारह बजे के बाद जब सांसदों ने सड़क पर ही धरना शुरू कर दिया, तो दिल्ली पुलिस ने मल्लिकार्जुन खड़गे, अखिलेश यादव, अभिषेक बनर्जी, डेरेक ओ ब्रायन और प्रियंका गांधी वाड्रा समेत तमाम नेताओं को हिरासत में लेकर पुलिस बसों में बिठाना शुरू किया। यहीं से पूरे आंदोलन ने एक ऐसा मोड़ लिया, जिसकी जानकारी खुद कांग्रेस के अधिकांश वरिष्ठ नेताओं को भी पहले से नहीं थी।
जैसे ही हिरासत में लिए गए नेताओं की बस आगे बढ़ी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी बस से नीचे उतर आए और पास ही स्थित आकाशवाणी भवन के स्वागत द्वार (गेट नंबर चार) की ओर बढ़े, जहां से चुनाव आयोग का मुख्यालय महज पचास गज की दूरी पर है। इस घटनाक्रम को लेकर यह दावा किया गया कि राहुल गांधी दीवार फांदकर परिसर में घुसे, लेकिन मौके के सत्यापित दृश्यों और प्रत्यक्षदर्शियों के विवरण से स्पष्ट है कि राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और सांसद दीपेंद्र हुड्डा सुरक्षाकर्मियों के रोकने के बावजूद आकाशवाणी भवन के मुख्य स्वागत द्वार से ही भीतर दाखिल हुए और परिसर में एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे धरने पर बैठ गए। इसके ठीक बाद कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल, पवन खेड़ा, इमरान प्रतापगढ़ी और बी.वी. श्रीनिवास आकाशवाणी भवन की बाउंड्री वॉल (चहारदीवारी) पर चढ़कर नारेबाजी करते देखे गए। शाम को पुलिस द्वारा सरकारी परिसर खाली करने की अपील और मीडियाकर्मियों को बाहर निकाले जाने के बावजूद राहुल गांधी ने वहां से हटने से इनकार कर दिया।
विवाद की असली जड़: एसआईआर और फॉर्म-6 में बदलाव का कानूनी सच ( ये भी पढ़े )
इस पूरे सियासी उबाल के केंद्र में मतदाता सूची का ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (एसआईआर) और फॉर्म-6 है। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, चुनाव आयोग ने चौबीस जून 2025 को बिहार से एसआईआर की शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य शहरीकरण, पलायन, अपंजीकृत मृत्यु और अवैध विदेशी नागरिकों के नाम हटाने के लिए घर-घर जाकर मतदाता सूची का सत्यापन करना बताया गया। अक्टूबर 2025 में इसे बारह राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में और चौदह मई 2026 को तीसरे चरण के तहत दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक, हरियाणा और पंजाब सहित सोलह राज्यों व तीन केंद्रशासित प्रदेशों में लागू कर दिया गया।
विवाद तब गहराया जब निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले वैधानिक ‘फॉर्म-6’ के ऑनलाइन संस्करण में एसआईआर के दौरान एक अतिरिक्त घोषणापत्र (डिक्लेरेशन) जोड़ दिया गया। विपक्ष का आरोप है कि इस अतिरिक्त शर्त के जरिए नए मतदाताओं, विशेषकर युवाओं, दलितों और वंचित वर्गों के नाम मतदाता सूची से काटे गए या पंजीकरण प्रक्रिया को जटिल बनाया गया।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और चुनाव आयोग के दावों की पड़ताल ( ये भी पढ़े )
विपक्षी मार्च को सबसे बड़ी ताकत घटना से ठीक एक दिन पहले यानी पांच अक्टूबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में हुई सुनवाई से मिली। दरअसल, छब्बीस सितंबर 2026 को चुनाव आयोग ने एक आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दावा किया था कि एसआईआर के लिए फॉर्म-6 के साथ जोड़े गए अतिरिक्त घोषणापत्र को माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा वैध ठहराया जा चुका है।
जबकि सर्वोच्च न्यायालय के आधिकारिक रिकॉर्ड इस दावे की पुष्टि नहीं करते। सत्ताईस मई 2026 के अपने आदेश में अदालत ने केवल चुनाव आयोग के एसआईआर कराने के अधिकार को मान्यता दी थी, किसी वैधानिक फॉर्म में बदलाव को नहीं। पांच अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने इस स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट करते हुए सख्त टिप्पणी की कि सर्वोच्च न्यायालय ने किसी भी संशोधित फॉर्म-6 को अपनी मंजूरी नहीं दी है। अदालत ने चुनाव आयोग से मूल रिकॉर्ड तलब करते हुए यह पूछा है कि वैधानिक फॉर्म में यह बदलाव किसके आदेश से और किस अधिकार के तहत किया गया। सर्वोच्च न्यायालय के इस स्पष्टीकरण से चुनाव आयोग की छब्बीस सितंबर की प्रेस विज्ञप्ति का दावा तथ्यात्मक रूप से गलत साबित हुआ है।
तीन चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति बनाम आंतरिक असहमति के साक्ष्य
विपक्ष के प्रदर्शन के बाद निर्वाचन आयोग के सूत्रों ने यह पक्ष रखा कि एसआईआर और फॉर्म-6 से जुड़े सभी निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की पूर्ण सर्वसम्मति से लिए गए हैं। हालांकि, आयोग के आंतरिक कामकाज से जुड़े दस्तावेजी साक्ष्य एक अलग तस्वीर पेश करते हैं।
प्रामाणिक जांच रिपोर्टों के अनुसार, तीन सदस्यीय आयोग में शामिल दो अन्य चुनाव आयुक्तों— सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी— ने पिछले दस महीनों के दौरान कम से कम चौदह बार औपचारिक रूप से अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं। इन आपत्तियों में यह उल्लेख किया गया कि कई महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले और फॉर्म-6 में ऑनलाइन घोषणापत्र जोड़ने जैसे कदम उनकी जानकारी या पूर्व सहमति के बिना उठाए गए। तीस सितंबर को जिन राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, वहां से आयोग ने चुपचाप इस अतिरिक्त घोषणापत्र को ऑनलाइन पोर्टल से हटा भी लिया, लेकिन आयोग ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि दो आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद इसे लागू करने की अनुमति किसने दी थी।
तीन सौ सांसदों और चौंसठ प्रतिशत जनसमर्थन के दावे का तथ्य-परीक्षण
आकाशवाणी भवन परिसर से मीडिया को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने चुनाव आयोग और सरकार की कार्यप्रणाली को ‘देशद्रोह’ करार दिया और कहा कि यह ‘वन मैन, वन वोट’ तथा संविधान बचाने की लड़ाई है। इसी दौरान उन्होंने दावा किया कि इस मार्च में उनके साथ तीन सौ से अधिक सांसद आए हैं, जो देश की चौंसठ प्रतिशत जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं।
संसदीय और चुनावी आंकड़ों की कसौटी पर राहुल गांधी का यह दावा अतिशयोक्तिपूर्ण है। लोकसभा और राज्यसभा के कुल विपक्षी सांसदों की संख्या मिलाने पर ही यह आंकड़ा तीन सौ के आसपास पहुंचता है, और चूंकि वर्तमान में संसद का सत्र नहीं चल रहा है तथा आम आदमी पार्टी ने मार्च का बहिष्कार किया है, इसलिए मौके पर उपस्थित सांसदों की वास्तविक संख्या तीन सौ से काफी कम थी। इसी तरह, चौंसठ प्रतिशत जनसमर्थन का दावा भी आधिकारिक चुनावी आंकड़ों से मेल नहीं खाता। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के आधिकारिक परिणामों के अनुसार, सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को कुल वैध मतों का लगभग तैंतालीस दशमलव तीन प्रतिशत वोट मिला था, जबकि इंडिया गठबंधन का संयुक्त मत प्रतिशत लगभग इकतालीस से बयालीस प्रतिशत के बीच था। यदि गैर-एनडीए सभी दलों के वोट जोड़ भी दिए जाएं, तब भी यह आंकड़ा छप्पन से सत्तावन प्रतिशत के करीब रहता है, चौंसठ प्रतिशत नहीं।
सत्तापक्ष का पलटवार और संवैधानिक संस्थाओं की साख का सवाल
विपक्ष के इस आक्रामक रुख पर भारतीय जनता पार्टी ने गोल मटोल जवाब देकर अपनी जिम्मेदारी सिमित कर ली है। जबकि सवाल भारतीय निर्वाचन आयोग से है। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने राहुल गांधी पर चुनावी हार की हताशा में संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने और आकाशवाणी भवन जैसे संवेदनशील परिसर में जबरन घुसकर अराजकता फैलाने का आरोप लगाया। शिवराज सिंह चौहान ने तार्किक प्रश्न उठाया कि जिस चुनाव प्रणाली और आयोग पर विपक्ष सवाल खड़ा कर रहा है, उसी के तहत केरल, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और झारखंड में विपक्षी दलों की सरकारें बनीं— क्या वे सभी जनादेश भी अवैध थे? वहीं चुनाव आयोग ने शाम को स्पष्ट किया कि किसी भी विपक्षी दल या नेता प्रतिपक्ष की ओर से आयोग से मिलने के लिए कोई औपचारिक समय (अपॉइंटमेंट) नहीं मांगा गया था। लेकिन सवाल अभी भी जस का तस है, जिसका जवाब सत्तापक्ष के पास नही है।
सड़क पर पुलिस बैरिकेड से लेकर आकाशवाणी भवन के भीतर तक चला यह टकराव अब सीधे तौर पर संवैधानिक जवाबदेही के मुहाने पर खड़ा है। आगामी शीतकालीन सत्र और सर्वोच्च न्यायालय में फॉर्म-6 के रिकॉर्ड की जांच से ही यह तय होगा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर उठा यह सियासी तूफान किस दिशा में थमेगा।

